लेकर कली, हैवान जिधर गए।
नोच-नोच जिस्म, उतर गए।
लुट गए कली-कली, फूल-फूल उधड़ गए।
और हम खड़े-खड़े इंतजार देखते रहे।
भेड़िये है घात में, पहरेदार देखते रहे।
बेटी, जो जल चुकी वासना की आग में।
थे रखे आंसू जैसे, उसी के भाग में।
डेरा भीड़ डाल चुकी, जिसके सुहाग में।
पांव तले रौंद डाला उसे फूल के बाग में।
सोच रहे हम जिसे सगे-सगे,
हुई देर, नींद से तब जगे,
खामोश खड़े, जैसे हाथ है बंधे, जैसे कान है कटे।
और हम चल दिए जहां-जहां हवा चली।
छोड़ बेटी, जिसके पांव तले रेत जली।
जला दिए-दिए, हम जिम्मेदार देखते रहे।
भेड़िये हैं घात में, पहरेदार देखते रहे।
पहले एक शैतान ने आगोश में जकड़ लिया।
बारी-बारी फिर भेड़ियों ने पकड़ लिया।
पहले अगवा किया, फिर आबरू की रकम लिया।
मिल-जुल मौज लिया, फिर सटक लिया।
वस्त्र नग्न हो गए,
दुष्ट मग्न हो गए,
देह के बाज़ार में, पापी दौलतमंद हो गए।
और हम स्तब्ध हैं केवल।
हाड़ मांस के खम्भ है केवलव
झुका आँख, कौमार्य का शिकार देखते रहे।
भेड़िये हैं घात में, पहरेदार देखते रहे।
दुलारी के हिचकी ने, फिर चीखों ने, दम तोड़ दिया।
भीतर ज्यादा छाले हैं बाहर से, तन को ऐसा फोड़ दिया।
छूत-अछूत, जात-पात भेड़िए भूल गए, शरम छोड़ दिया। दिखा घमंड पौरुष का, नया समाज ऐसा जोड़ दिया।
धरती माँ भी सिसक रही।
विश्वास की नींव खिसक रही।
बेटी खुद से चिपक रही, ठिठक रही, झिझक रही।
और हम यह सोचते रहे, दे जवाब क्यों?
इस पाप का हम, करें हिसाब क्यों?
जला मोम की बत्तियां, त्यौहार देखते रहे।
भेड़िये हैं घात में, पहरेदार देखते रहे।
दीप जले घर आंगन में, डर का एक कण न हो।
जहां कभी किसी द्रौपदी का, चीर हरण न हो।
बना ऐसा दो समाज, जहां यौन से मरण न हो।
भोग का रोग न हो, ऐसे भय का क्षण न हो।
और हम भेड़ियों को भगा-भगा,
ठूस जेल मे, मांगे मौत की सजा,
घुट-घुटकर क्यों जिए? सियासत को पूछ रही प्रजा।
उठो-उठो, चलो-चलो,
यूं पड़े-पड़े हाथ मत मलो।
ऐसा न हो कि फिर से हम, अखबार देखते रहे।
भेड़िये हैं घात में, पहरेदार देखते रहे।
भेड़िये हैं घात में, पहरेदार देखते रहे।
.-जगदीश चंद्र कापड़ी
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