रूप है शृंगार का , ममतामयी अवतार का
प्रतिबिम्ब है वो प्यार का , सौहार्द का , कल्याण का ।।
है बहुत कुछ पर मगर , इतना अभी तुम जान लो ,
ऐसे किसी को न मिले , मिलती बस अनुराग से
शृंगार स्त्री से सजे , वो न सजे शृंगार से ।।
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