वो जो , घर को संवारती है ।
स्वयं से पहले ,सबको रख जाती है ।
खाना बनाती है , सबको खिलाती है ।
दुनिया उनको , दया से निहारती है।
लोग कहते हैं, जो कुछ नहीं कर पाती है
वो स्त्री, गृहणी बन जाती है ।।
लोग उनको कहते हैं बेचारी , वो जो अपने काम से कभी न हारी ।
हम पागल उनको कहते हैं , बेचारी ।।
हम उनको दया दिखाते है ,
बिन जिनके सब भूखे रह जाते हैं। ।
जो खुद सब- कुछ कर जाती है ,
वो न पात्र दया की है।।
अपनी बुद्धि का, उत्थान करो
दया दिखाकर , उनका न अपमान करो ।।
संघर्ष सबके जीवन से अङा है ,
हां ये सच है उनका त्याग बङा है ।।
करना है तो एक काम करो , उनका तुम सम्मान करो
दया दिखाकर बिन शब्दों के , खुद का ना गुणगान करो
उनका तुम सम्मान करो , उनका बस सम्मान करो ।।
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