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माँ

                
                                                         
                            सहमी हुई आँखों से,
                                                                 
                            
विवश होकर ,
क्यों देख रहे हो मेरे लाल,
पत्थर तोड़ तोड़ कर,
मेरा ह्रदय पाषाण नहीं हुआ,
तपती दोपहरी में,
बस पानी ही मिलता है,
सुखी छातियों से,
क्या दूध निकलता है ?
इस तरह सड़क के किनारे,
खपच्चियों के झूले में,
बिताने होँगे कई साल,
गर्मी से झुलसे होंठों पर,
आ गयी मुस्कान उदास,
तुम्हारे नसीब का भी,
यही होगा हाल,
तुम्हे नहीं मालूम,
तुम अनमोल हो,
तुम्हारा चेहरा,मेरी विवशता,
कैमरों की रोशनी है,
दीवारों की शोभा है,
यही तो भारत की,
सच्ची तस्वीर है !

- इन्दु सिन्हा
रतलाम(MP)

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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