जस बान चलैं तस बूँद गिरैं पर घाव नहीं तन पै मन पै।
उफनाय रहे सब खेत चढ़ै जल वेग बहै बढ़ि मेड़न पै।
लहराय रहे सब धानन के तन भाव उमंगन का पनपै।
त्रयताप मिटे वसुधा बिहँसी जब नीर परा सबके तन पै।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X