आजु गयो बगिया जब मैं मन गल्ल भवा लखि सुंदरताई।
मंजुल पुष्प हँसैं कलियाँ मुसुकाय रही करिकै पहुनाई।
तालु खड़ा लहराय रहा जनु थाल लही जल को छलकाई।
चूमत भूमि सबै बिरवा सिगरे तन लागि रही पुरवाई।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X