शक्ति स्वरुप विलोकत नैन कहे मुख बैन यही सुफले।
ध्यान धरूँ नित मातु तुमार हिया बिच भाव सदैव पले।
मोह रहे पद पंकज में तुमरी हमरे हिय ज्योति जले।
चाहत है मन भक्ति सदा वर देव यही मन ना मचले।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'
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