करिए प्रयास, मत छोड़ो कभी आस, मानो मैं हूँ प्रभु दास, धैर्य धारिए हृदय में।
तम कीजै नाश, राखि ज्ञान का प्रकाश, जपो नाम स्वांस स्वांस तभी बचोगे प्रलय में।
दूर हो या पास, मीत रखो एक खास, जो न होने दे निराश, कभी कठिन समय में।
हास परिहास, में सदैव हो मिठास, करो दुखियों का त्रास, दया नैनन निलय में।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X