गोपिन नाच नचावत है यमुना तट पै यहु नंद दुलारा।
बेनु बजावत भौंह उलारत भाव हियै उपजावत प्यारा।
रूप धरे नटनागर का पट पीत लसै लखि शोक विहारा।
देखत ही मन सोचत है यहु कोटिन काम लजावन हारा।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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