लापरवाह सुखी जग में परवाह करै सबही दुखभोगी।
योग वियोग सभी यहि के बस रूप हवै लखि पावत योगी।
जानत मानत हैं कुछहू नहिं वै जग में सब केवल भोगी।
ज्ञान हवै पर मान नहीं उनका वसुधा बस मानत रोगी।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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