गोकुल में बजे बधाई।
जनमें हैं किशन कन्हाई।
भादौं की रात अँधेरी।
घनघोर घटाएँ घेरी।
था काला पक्ष दिशा भी।
तिथि अष्टम मध्य निशा भी।
चपला चमकैं घन गरजै,
जल बरस रहा अरराई।।१॥
वसुदेव देवकी बंदी।
है साँसों पर पाबंदी।
ऐसे में हरि हैं आए।
बालक का रूप धराए।
बेड़ी बंधन सब टूटे,
नैनों में खुशी समाई।।२॥
सब रक्षक निद्रा सोए।
माता ने नयन भिगोए।
बालक वसुदेव धरे सिर।
गोकुल की ओर चले फिर।
यमुना जल अति उफनाया,
पर झुकी चरण छू माई।।३॥
गोकुल वसुदेव पधारे।
पहुँचे जसुदा के द्वारे।
जसुदा ने पुत्री जाया।
बालक दे सुता उठाया।
ले पहुँच गए कारा में,
गोकुल में खुशियाँ छाई।।४॥
सब देव मगन मन हरषे।
बहु पुष्प गगन से बरसे।
हैं चले दरस पाने को।
हरि छवि में खो जाने को।
रत्नेश भजन में खोया,
मन मूरत लिया बसाई।।५॥
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X