आइ गई गुड़िया सिर पै पर कंत नहीं अब लौं घर आए।
को सब लाइ धरी घर मा लरिका सब घूमि रहे मुँह बाए।
मारग भूलि गए हमरे प्रिय या कि गए पर नारि फँसाए।
सोचि रही सजनी सजि कै मन में भाव भरे अपने घबराए।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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