ज्योति जले मन मंदिर में नित ध्यान तुमारहि अंब करूँ।
प्रेम बसे हिय माहिं निरंतर औरन के मन प्रेम भरूँ।
देख सकूँ न दुखी जन को उनके हित में नित मैं विचरूँ।
दो वर माँ मुझको यह ही यदि काल लड़े तब भी न डरूँ।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X