जनमें हैं किशन कन्हैया, जन जन के भाग जगे हैं।
हर्षित पूरी वसुधा है, तन मन सबके उमगे हैं।
हर्षित वसुदेव देवकी, दोनों कारा के भीतर।
दोनों निज पुण्य सराहें, नैना जल से भी हैं तर।
खुशियों की इस वेला में, सारे दुख गए ठगे हैं।।१॥
आते ही बंदी गृह के, खुल गए सभी थे ताले।
रक्षक सोए निद्रा में, मुख से बिन बैन निकाले।
प्रभु रूप देखकर मन के सारे भय भाव भगे हैं।।२॥
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सब देव मगन मन नभ में, दर्शन करने को आए।
छवि देख अलौकिक सबने, ही भाव सुमन बरसाए।
भावों का वेग बढ़ा तो, करने जयकार लगे हैं।।३॥
गोकुल भी धाम हो गया, बस उनके आ जाने से।
घर नंद बन गया मंदिर, उस बालक को पाने से।
बन ग्वाल-बाल सुर आए, जो उनके परम सगे हैं।।४॥
माखन खा मटकी फोड़ी, मुरली पर जगत नचाया।
उँगली पर चक्र धरा तो, दुष्टों से जगत बचाया।
रत्नेश शीश कर धर दो, तव पद रज सदा पगे हैं।।५॥
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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