मातु जगदंब अंब शक्ति का प्रवाह करो, भारत का जन जन सिंह के समान हो।
सेवक हो आपका व रक्षक हो वतन का, उसकी दहाड़ में प्रलय का आह्वान हो।
बेरियों के झुंड छुपे होवें चाहे जहाँ कहीं, उसके लिए सदैव मृत्यु का विधान हो।
राष्ट्र वेदना को देख वेदना को भेदने को, सव्यसाची कर खर शर व कमान हो।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'
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