हो जाओ तैयार समय भीषण है आने वाला।
दानव दल तैयार खड़ा है लेकर दारुण ज्वाला।
अभी पड़े हैं बंधन उन पर बैठे मन को मारे।
जहाँ कहीं मौका पाते वो रहते शीश उतारे।
तुम बैठे हो अपने घर में बस भगवान सहारे।
कमर नहीं यदि कसे अभी वो नाचेंगे पी हाला।।१॥
उनकी नजरों में केवल बकरा ही हो यह जानो।
शस्त्र-शास्त्र दोनों उपयोगी अवसर पर ही तानो।
कहना ही है कर्म हमारा मानो या ना मानो।
भाईचारे में जो उलझा वो बन गया निवाला।।२॥
उनका दीन सिखाता उनको केवल खून बहाना।
वही खून यदि काफिर का हो निश्चित जन्नत जाना।
खान-पान पहनावा देखा फिर भी ना पहचाना।
जीती मक्खी निगल रहे क्या पड़ा अकल पर ताला।।३॥
खुद को जानो तुम हो क्या यदि जान गए तो ज्ञानी।
कर्म विमुख जो हुआ समझ लो वह है अति अज्ञानी।
धर्म सनातन से दूरी कर की है बस नादानी।
यदि अस्तित्व बचाना है रत्नेश रखो कर भाला।।४॥
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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