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गुरु की चरण रज

                
                                                         
                            गुरु की चरण रज माथे पे लगाऊँ सदा, माता जो हमारी ज्ञान हम पे लुटाती है।
                                                                 
                            
पिता सारे जीवन की पूँजी सुत पे लुटाता, उसके ही द्वारा जग साख मिल पाती है।
तीसरा जो देता पुस्तकीय ज्ञान हमको है, भले व बुरे की सीख हमें मिल जाती है।
चौथा जग से छुड़ा के जोड़ता प्रभू से हमें, जीव को प्रकृति यह बहुत सुहाती है।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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