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मानव तन दुर्लभ है भाई

                
                                                         
                            मानव तन दुर्लभ है भाई। जाके करम सुघरि वहु पाई।
                                                                 
                            
जनम हुआ तब कछु सुधि नाहीं। प्रभु का कौल गयो बिसराहीं।
समय गवा बालापन आवा। खेलकूद में ताहि गँवावा।
कुछ बरसन मा भयो किशोरा। पढ़्यो नहीं देख्यो चहुँ ओरा।
युवा भयो तन मन बौराया। ताते ही कछु समझ न पाया।
आवन लागी बहुत सगाई। मिलि सबही ने ब्याह कराई।
अब आगे कुछ का बढ़ा है। घरवाली का रंगु चढ़ा है।
अब घर चुन्नू मुन्नू आए। हम दूनौ प्रानी सुखु पाए।
लोनु तेलु मा जीवनु लागा। दुख बाढ़ा सुखु सिगरा बाढ़ा।
तब तक दुइ युग्मित चलि आए। करू करैला नीम चढ़ाए।
अब जीवनु संग्राम भवा है। सूझै कौनिव नहीं दवा है।
लागै परा मौत से पाला। गृह कारज नाना जंजाला।
गौर बरन तन दीखै काला। गृह कारज नाना जंजाला।
जीवन भा मकरी का जाला। गृह कारज नाना जंजाला।
सोची हम घर छोड़ी साला। गृह कारज नाना जंजाला।
हमसे नीके कूकुर ब्याला। गृह कारज नाना जंजाला।
ल्यौ रत्नेश नदी या नाला। गृह कारज नाना जंजाला।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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एक महीने पहले

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