द्वेष की भावना त्याग दीजै सदा मानिए ये कहा देर ना कीजिए।
प्रेम को धारिए दंभ को मारिए ध्यान संसार पै ना कबौ दीजिए। देह में रोग व्यापै कभी भी नहीं छोड़ि कै माहुरों को सुधा पीजिए।
आदमी देह को पाइ भक्ती करो नाम को ही सदा रे मना लीजिए।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'
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