भेजति हौं दुख की चिठिया पढ़िकै अब अंब निहारि लियौ।
पूतु तुमार पुकारति है नित शाम सुबेर उबारि लियौ।
शीश धरी दुख की गठरी निज हाथ बढ़ाय उतारि लियौ।
संकट हौ सबके हरती हमरे सिर हाथ पसारि लियौ।।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'
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