छेद हैं तमाम किंतु काम करती बहुत, आटे को वो चाल कर चोकर निकालती।
करवा के पर्व पर सजती सँवरती है, बाकी पूरे वर्ष में न रोग यह पालती।
नारियाँ मँगाती बड़े शौक से दुकानों में से, टूटी-फूटी तो नहीं उसे हैं देख डालती।
चाँद देख पूजन के बाद पति देखने को, दीपक उसी में रख करके हैं बालती।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'
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