बोलत मोर बगीचन में मन भावन पावन सावनु है।
शोर करैं घन घोर चढ़े नभु लागि रहा बिजुरी बनु है।
प्रीति छुड़ाय बसे परदेस पिया बिन नीरस जीवनु है।
आस लिए पिय का लखती मगु आव दुखी विरही मनु है।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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