भाव का प्रभाव आज मन पे गया है छाय, झूमि रहा देखि-देखि काले-काले बदरा।
गरजत घनन के बीच दामिनी की दुति, प्रकृति नटी ज्यों फहराय रही अचरा।
पुरवा पवन पात पेड़न झुलाय रही, मगन किसानन के लखि-लखि जियरा।
दोपहर दिन दिख रहा है निशा के सम, लागति उमस में बहा है नैन कजरा।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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