आइ गए घन हैं नभ में अब बारिश में नहिं देर लगेगी।
खेत जुताइ किसान दिए उर बीच नई इक आस जगेगी।
ऊमस खूब भई अब लौं गरमी जग की रिसियाय भगेगी।
मेघ दपा दप मारि उजेरु गड़ा गड़ की धुनि तेज दगेगी।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
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