लागि रहा कर वज्र लिहे सुरराज खड़े बिजुरी चमकावैं।
या फिरि लै गगरा जल के अपने कर ते सब पे ढरकावैं।
छूँछि हुवैं गगरा जबहीं उनका उठवाय लड़ाय बजावैं।
लोग कहैं बदरा गरजैं यह बात धरैं मन कान दबावैं।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'
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