देखन चाहत हौ बदलाव मुला निज अंतर सोचत नाहीं।
भीतर से शुरुआत हुवै तब ही जग में वहु आय दिखाहीं।
लोग यहै बस चाहि रहे सब लोग करैं निज जीवन माहीं।
पै यह जानि लियौ ढँग ते निज का बदलौ खुद ही हुइ जाहीं।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X