सिंह की सवारी करे अष्ट भुजा धारे माई, खडग त्रिशूल चक्र आशिष लुटाती है।
अन्य चारों करों में कमल धनु बान गदा, शीश पे मुकुट दिव्य शोभित सुहाती है।
बिंदिया लसी ललाट मुख तेज ज्योति सम, कंठ पुष्प मणियों की माला लहराती है।
पापियों के हृदय विदार के संहारती माँ, भगतों पे अपनी कृपाएँ बरसाती है।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'
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