अंजुलि में जल को भरि कै सब पीवत हैं जब कंठ सुखाहीं।
अर्घ्य दियौ तबहूँ यहि से सब देवन के ढिँग में पहुँचाही।
अर्पण हेतु भरौ कुसुमानि यही महँ द्यो फिरि देव चढ़ाही।
दान करौ जब अन्न व भोजन होउ प्रसन्न मनहिं मन माहीं।
-इन्द्र प्रसाद लोधी 'रत्नेश'
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