तुम्हारी आँखों का ये निशाना कि मेरे दिल में उतर रहा है
तुम्हें नहीं है ख़बर ये दिल की कहाँ कहाँ से गुज़र रहा है
किये थे जिसने हजार वादे कहाँ गया है वो वादा करके
बनाया तुमने जिसे है हाक़िम वो वादा करके मुकर रहा है
मुहब्बतों में उलझ रहे हो ज़रा सा घर का खयाल कर लो
नहीं मिलेगा सुकून इसमें नशा जो इसका उभर रहा है
सिखा रहीं हैं हमें सियासत वो आज कल की जवान नस्लें
मुहम्मदी हूँ यूँ चुप हूँ वरना खलीफा मेरा उमर रहा है
कहाँ वो गुम हैं जो बन रहे थे सियासतों वो कौम ऐ रहबर
गरीब मरता रहेगा यूँ हीं कहाँ किसी को नज़र रहा है
-इम्तियाज़ रज़ा अली खान
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