चढ़ कर छाती अंग्रेजो की मस्तक तक बलिदान दीया
पुरखो ने हमारे लहू से अपने आजाद हिंदुस्तान किया
धक धक करके धड़क रहा था सपना वो आजादी का
कभी दिया टीपू था हमने कभी तो तुर्रम खान दिया
अंग्रेजों के सारे मनसूबों को जड़ से उखाड़ दिया
और गोरी सरकारों के उपर अपना परचम गाड़ दिया
खून बहे हैं लुटी जवानी हँसकर सीस कटाए हैं
ये धरती है बलिदानों की फांसी को अपनाये हैं
अपनों ने थी की गद्दारी उसकी अलग कहानी है
और लड़ी वीरता से मैदां में वो झांसी की रानी है
मंगल,अहमद,भगत सिंह, असफाक ने फर्ज़ निभाया,
इस भारत की आन बचाने हँसते-हँसते शीश चढ़ाया।
जब तक सूरज-चाँद रहेगा, गूँजेगा यह अमर विधान,
वीरों के बलिदानों से ही जीवित है ये हिंदुस्तान।
-इम्तियाज़ रज़ा
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