ये रास्ते, ये बस्तियाँ, ये गुल, महकती वादियाँ,
तेरे आगे चाँद, तारे, चाँदनी—कुछ भी नहीं।
तेरी आँखों के सामने, जाम भी, सागर भी क्या,
तेरी नज़रों से बढ़कर, मयकशी कुछ भी नहीं।
तेरी ख़ुशबू से महकती है फ़िज़ा की हर कली,
गुलशनों की ये महक, ये ताज़गी कुछ भी नहीं।
तेरी एक मुस्कुराहट पर फ़िदा आलम हुआ,
हुस्न की सारी अदाएँ, दिलकशी कुछ भी नहीं।
तू जो महफ़िल में चले आए तो रौनक आ गई,
तेरे आगे रंग-ओ-बू की दिलकशी कुछ भी नहीं।
ताज वालो से कहा कि तुम जो देख लो उसे
उसके आगे ताज ये, बादशाही कुछ भी नहीं।
कह रहा है 'इम्तियाज़' अब इश्क़ का ये फ़लसफ़ा,
गर तू न हो जो हमसफ़र, तो ज़िंदगी कुछ भी नहीं।
-इम्तियाज़ रज़ा अली खान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X