ज़िंदगी में हमसफ़र कोई नहीं, कोई नहीं
इस सफ़र का हमनज़र कोई नहीं, कोई नहीं।
जिसको अपना मानकर हर मोड़ पर चलता रहा,
अब उसी-सा मोतबर कोई नहीं, कोई नहीं।
वक़्त ने हर दोस्त का चेहरा बदलकर रख दिया,
आज दिल का हमनज़र कोई नहीं, कोई नहीं।
मुस्कुराहट ओढ़कर हम जी रहे हैं आज भी,
दर्द जो समझे मगर कोई नहीं, कोई नहीं।
अश्क आँखों में छुपाकर मुस्कुराते हैं सभी,
दिल का होता राज़गर कोई नहीं, कोई नहीं।
हर किसी ने काम निकाला, फिर किनारा कर लिया,
साथ देता उम्र भर कोई नहीं, कोई नहीं।
दिल की बस्ती लूटकर सब मुस्कुराते ही रहे,
हाल मेरा पूछकर कोई नहीं, कोई नहीं।
जिनको अपनी जान से बढ़कर समझ बैठे थे हम,
वक़्त आया तो उधर कोई नहीं, कोई नहीं।
अब दुआ भी सोचकर अपने लिए माँगें कहाँ,
साथ देने को मगर कोई नहीं, कोई नहीं।
इम्तियाज़ ये वफ़ाओं का मिला कैसा सिला तुझे
पूछने वाला इधर कोई नहीं, कोई नहीं।
-इम्तियाज़ रज़ा अली खान
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