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रोम रोम में राम

                
                                                         
                            दूर देश में रहने वाले
                                                                 
                            
कैसा है जीवन तेरा
याद करे क्या दिल अब भी
मिट्टी का वो सवेरा ?

माँ की बाते घर की खुशबू
अपनो का वो प्यार
देश का पानी देश की रोटी
सब लगता था संसार

या अब दिल को भा गया
परदेस का हर रंग ?
पिज़्ज़ा बर्गर में खो बैठा
अपना सादा ढंग

रोम भले ही जन्मस्थल हो
पाश्चात्य विचारो का
पर यहां तो वास है हर पल
राम के सत्कारों का

जीवन में भी राम बसे हैं
अंत समय भी राम
रोम रोम में गूंज रहा
बस राम राम राम
-रियो
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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