परेशान है हिंदी अपने ही घर में
चाहकर भी सो नहीं पाती चैन से
अंग्रेजी की अकड़ कुछ बड़ सी गई है
घर घर में अंगद सा पांव जमाती ठाठ से
हिंदी के हर शब्द में बसती है तहज़ीब
अंग्रेजी में यू से ही सब सिमट गया
आप तुम तू के भाव हैं अलग अलग
पर वहाँ हर रिश्ता जैसे सिमट गया
हिंदी है हमारे अंतर्मन की भाषा
पर अपनो के व्यवहार से ही आहत है
ठगी सी लगती है अपनी ही पहचान
कोई जैसे अपनेपन से वंचित है
दोष नहीं है नन्हें मुन्नों का इसमें
माता पिता की भी है कुछ मजबूरी
परिवेश ही कुछ ऐसा बन गया है
जहां अंग्रेजी की गहरी धूरी है
अंग्रेजी का मायाजाल फैला ऐसा
हर कोई उसमें उलझता जा रहा है
हृदय में अब दोनो का घर तो है
पर संतुलन कहीं खोता जा रहा है
विदेशी सीख रहें हैं हिंदी को
हम अंग्रेजी की ग्रामर रट रहे है
अपनी ही जड़ो से दूर होते होते
खुद को ही जैसे खोते जा रहे हैं
-रियो
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