मंच नहीं हिमालय था वो मेरे जीवन का प्रथम विस्तार
गला सूखता जाता था धड़कता था दिल बार बार
मन में उठता एक ही प्रश्न कैसे करूंगा मैं पार
तीन सीढियां वो मंच की नहीं मानो हिमालय की श्रृंखला
हर कदम पर जैसे हिम्मत की मेरी परीक्षा
पर हौसलो ने कहा रुकना मत अब बस आगे बढ़ना है
और मंच पर मैं चढ़ गया क्योंकि आज खुद को गढ़ना है
पल भर में मंच पर था
सामने माईक मुस्करा रहा था
कह रहा हो जैसे अब बोल भी दो
जाने क्यों दिल घबरा रहा था
थामा माईक को ज्यों ही हिम्मत ने भी हाथ थाम लिया
डर कहीं खो गया आत्म विश्वास ने भी नाम लिया
श्रोताओं की थी भीड़ नज़रें सब मुझ पर टिकी थी
पर उस पल लगा मेरी सारी मंजिले यही सिमटी थी
ऐसा लगा मानो मैने एवरेस्ट छू लिया
ड़र को अपने आज जीत लिया
फिर क्या था शब्दों ने पकड़ी रफ्तार आवाज़ में था जोश
हर पंक्ति में विस्वास हर शब्द में होश
एक सांस में ही कविता का संसार बसा दिया
दिल की हर धड़कन को मैंने शब्दो में सजा दिया
और फिर गूंज उठी तालियां तालियां ही तालियां
जैसे मेहनत ने खुद बजाई हो अपनी सफल कहानियां
खुश हो गया अंतर्मन भर आया था मन
क्योंकि आज जीत लिया था मैंने खुद का ही रण
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