पानी को सूखा और साँसों को महज़ इक हवा कह दूँ,
तू ही बता, कैसे मैं तेरे इस दिए दर्द को दवा कह दूँ?
जिस इश्क़ ने छीन ली मुझ से मेरी ही पहचान,
कैसे उस तबाही को महज़ तक़दीर की ख़ता कह दूँ?
जो राख हो चुकी हैं पलकों पे ख़्वाबों की बस्तियाँ,
कैसे मैं उन बुझे चराग़ों को रौशन शमा कह दूँ?
तूने तो छोड़ कर हमें 'आज़ाद' कह दिया,
अब कैसे इस क़फ़स को खुला आसमाँ कह दूँ?
जिसे सजदे की तरह माँगा हो हर एक दुआ में,
अपने ही ईमान से हार कर, कैसे मैं तुझे बेवफ़ा कह दूँ?
तुझसे ही तो सीखा था मैंने ख़ुद पर एतबार करना,
अब तू ही बता, इस टूटे भरोसे को क्या दुआ कह दूँ?
आईने में भी अब जो अपना अक्स नज़र नहीं आता,
उस बे-नाम वजूद को कैसे मैं 'मैं' कह दूँ?
जिस सफ़र में अब कोई मंज़िल ही नहीं बची,
उस रास्ते को कैसे मैं अपनी ज़िंदगी का पता कह दूँ?
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