मिली कुर्सियां जब से उनको.....
आंगनबाड़ी नहीं फलाने,
बनवा पाए पांच साल में।
आने दो पावर में हमको,
तो विद्यालय बनवा देंगे।
मिली कुर्सियां जब से उनको,सारे मुद्दे भूल गए।
नाली नाला और खड़ंजा,
हर बस्ती में बनवाएंगे।
नहीं बिकेंगे हम पैसे पर,
अधिकारी से लड़ जायेंगे।
मिली कुर्सियां जब से उनको,सारे मुद्दे भूल गए।
कहते थे अन्याय न होगा,
रिश्वत बंद काम खूब होगा।
मनरेगा का लाभ सभी को,
सच में भैया खूब मिलेगा।
मिली कुर्सियां जब से उनको,सारे मुद्दे भूल गए।
वादा था अच्छा करने का,
सबको साथ में लेकर के।
रात का दिन जो किए बेचारे,
काम नहीं हो रहे हैं उनके।
मिली कुर्सियां जब से उनको,सारे मुद्दे भूल गए।
नहीं थे जब तक राजनीति में,
स्वयं को सबसे जोड़ लिए।
आ गए राजनीति में जब वह,
वह अपनों से बड़ी दूर हुए।
मिली कुर्सियां जब से उनको,सारे मुद्दे भूल गए ।।
काम नहीं जब हुआ गांव में,
राजनीति तो करेंगे लोग।
तभी विपक्षी हावी हो गए,
जनता इसमें करेगी क्या...।
मिली कुर्सियां जब से उनको,सारे मुद्दे भूल गए।
- होरीलाल "विनीता"
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