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ये अब शायद ही कभी उतरेगा।

                
                                                         
                            अहा ये कैसा युद्ध छिड़ गया,
                                                                 
                            
हर तरफ बढ़ गई दानवता,
देवत्व सबमे किधर गया,
कौन कैसे लड़ेगा,
कौन कैसे जीतेगा,
और कौन कैसे हारेगा,
ये ही सवाल हर किसी को यहां
हतप्रभ कर गया,
में मेरा जब स्वयं दुश्मन बन बैठा,
तो विरद का कोई क्या करेगा,
ये समर भूमि के गीतों को मत गूंजने देना,
क्योंकि मातम ही यहां ऐसा फैला कि,
ये अब शायद ही कभी उतरेगा।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
58 मिनट पहले

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