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मैं ज्ञान का प्रज्वलित अग्नि हूँ

                
                                                         
                            मैं ज्ञान का प्रज्वलित अग्नि हूँ
                                                                 
                            
जो जल आ रही है कहीं कितने कालों से
कभी शून्य में तो कभी चेतना में
तो कभी मानव कल्याण की यज्ञ में
क्योंकि मैं भारत हूँ
जो सदा लगी रही है ज्ञान की आहरण में।
मुझे कभी बुझने नहीं दिया
मेरे ज्ञानामृत से जन्मे मेरे संतानों ने
जो अमर कर गए वेद, उपनिषद्
को उनके द्रष्टा बनके
तो कभी पुराणों जैसी शिक्षाप्रद कथाएँ लिख के
तो कभी रामायण, महाभारत जैसे महान इतिहास रच के
तो और कभी अर्थशास्त्र जैसे शास्त्र गढ़ के।
ब्रह्माण्ड, प्रकृति के नियम को सनातन धर्म कह लाए
लेकिन दूसरों ने उन्हें हिन्दू बुलाए
जो व्याप्त था सिंधु से सिंधु तक
मैं 'अतिथि देवो भव' बोल के सभी को सम्मान दिया 'बसुधैव कुटुंबकम् ' कह कर दुनिया को अपनाया
समय बीतते गया, लोग मुझे विश्व गुरु से
सोने का चिड़िया समझ कर लूट गए।
मेरी संस्कृति बदली, धर्म बदला, मेरे
बच्चे बदल गए।
गुरू कूल तोड़ कर आधुनिक शिक्षा खड़ी हुई
मेरे ज्ञान को चोरी कर के कोई ओर महान बन गये
मेरे इतिहास को मिथ्या, काल्पनिक बताए
मेरी दि हुई परंपरा को अवैज्ञानिक
संस्कार, संस्कृति को कुसंस्कार बुलाए
क्यों कि मेरे बच्चे भूल गए प्रश्न करना
और उनके पिछे का विज्ञान, कारण जानना ।
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एक महीने पहले

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