तुमने
ऊँची-ऊँची इमारतें तान लीं ,
अंतरिक्ष में बस्तियाँ बसाने के नक्शे बना लिए ,
मशीनों को इतना चालाक कर दिया कि
वे इंसानों जैसा सोचने लगीं ,
पर इस सब के बीच , एक छोटी सी चीज़ कहीं पीछे छूट गई -
तुम भूल गए मानवता ,
तुम भूल गए मानवीय मूल्य!
तुमने तरक्की की अंधी दौड़ में रफ्तार को ही धर्म मान लिया ,
आगे निकलने की होड़ में बगल में गिरे हुए भाई को कुचल दिया ।
तुम्हारे पास स्क्रीन पर दुनिया भर के दुखों के लिए
'लाइक' और ' शेयर 'हैं ,
पर पड़ोस के घर से उठती चीख को सुनने के लिए कान नहीं हैं।
तुम संवेदनाओं का व्यापार करना सीख गए ,
पर संवेदनाओं को जीना भूल गए।
तुम भूल गए कि भूख सिर्फ एक आँकड़ा नहीं होती,
वह किसी खाली पेट की तड़प होती है।
तुम भूल गए कि न्याय सिर्फ
अदालतों की फाइलों में बंद कोई तारीख नहीं,
वह एक आम आदमी की आखिरी उम्मीद होती है।
मशीनें आज इंसानों की तरह हंस और रो रही हैं ,
और तुम, जो हाड़-मांस के इंसान थे
धीरे-धीरे एक ठंडे , संवेदनहीन रोबोट में तब्दील हो गए।
तुमने धर्म, जाति और पैसों के इतने ऊँचे पहरे बिठा दिए ,
कि उनके पार झांकती हुई किसी की लाचारी
तुम्हें दिखाई ही नहीं देती।
यह कैसी आधुनिकता है बंधु ,
जहाँ इंसान सब कुछ याद रखने का दावा करता है ,
गूगल से लेकर इतिहास तक सब उसकी उंगलियों पर है ,
पर वह बस एक ही बात भूल जाता है कि -
इस दुनिया में रहने के लिए , सबसे पहले इंसान होना ज़रूरी है।
- शर्मावान सुनिल
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