सुनो! ईश्वर कुछ बोल रहा है
उसका भी खून खोल रहा है..
कह रहा है कि मैंने तुम्हें इंसान बनाया..
इस धरा का मेहमान बनाया
तुमने धर्मभेद का ज्ञान पढ़ाया ..
भोलो को शैतान बनाया..
लूहु को सरेआम बहाया..
बर्बादी को खुलकर गया..
ईमान क्या है तुम भूल गये हो..
स्वार्थी बनकर फूल गये हो..
कांटो को तुम बो रहे हो..
इंसानियत को खो रहे हो..
मदिरा पीकर सो रहे हो..
ईर्ष्या का बोझ ढो रहे हो..
संवेदनाये मरी हुई फिर क्यों तू जिंदा है.
तेरा वजूद ही तुझ पर बहुत शर्मिंदा है.
तुम्हारे पापों से मेरा झुका हुआ यह कंधा है.
अप्रत्यक्ष रूप से तू भी गूंगा, बहरा, अंधा है..
तुमने मेरी पूजा को धंधा बना डाला ..
मेरे नाम पर आपस में फंदा बना डाला..
मेरे घर के लिए आपस का घर उजाड़ रहे हो..
वेद ,क़ुरान ,गीता के पेजों को तुम फाड़ रहे हो..
मेरे नाम पर तुम ये दुनिया मत बर्बाद करो..
अमन बढ़ाओ यारों तुम ,ना लव जेहाद करो..
हाथों को शूलों मुक्त करो..
ये चमन खुशबू युक्त करो..
जैसा मैंने बनाया था वापस ऐसा कर दो तुम..
जो रिक्त हुआ कलश प्रीत का वापस उसको भर दो तुम..
मुझको रखो दिल में तुम ,मंदिर मस्जिद के लिये मत लड़ो...
जो निर्धन लोग बिन घर के हैं ,उनके लिए आगे बड़ो..
बात मान लो मेरी मैं तुम्हें फिर इंसान कर जाऊंगा..
मेरे लिए जो मरे आपस में तो मैं खुद ही मर जाऊंगा...
- हिम-अंश
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