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मैं ज़िंदगी से हर एक हिसाब चुका कर आया हूँ।

                
                                                         
                            मैं राहों के पत्थरों से टकरा कर आया हूँ,
                                                                 
                            
ठोकरें लिखी थीं क़िस्मत में सो खाकर आया हूँ।

सीने में दफ़्न हैं जो अन-गिनत घाव मेरे,
मैं उन्हीं ज़ख्मों पे नमक लगाकर आया हूँ।

कोई क्या ही छीनेगा अब मेरी खुशियाँ मुझसे,
मैं अपने ही हाथों से सब कुछ लुटाकर आया हूँ।

न पूछ हाल मेरा इस शिकस्त-ए-दिल के बाद,
मैं अपनी लाश पे खुद अश्क बहा कर आया हूँ।

कोई पूछे तो कह देना-बहुत खुश हूँ मैं अब भी,
मैं अपनी खामुशी में खुद को छुपाकर आया हूँ।

अब मौत भी आए तो मुस्कुरा के मिलूँगा 'लाला',
मैं ज़िंदगी से हर एक हिसाब चुका कर आया हूँ।
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1 hour ago

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