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कविता - सुकून

                
                                                         
                            आसमान में ढूंढता सुकून हूँ,
                                                                 
                            
चाँद-तारों में ढूंढता गुरूर हूँ।
चलने लगा हूँ आग के ढेरों पर,
वक़्त भी बैठा है वक़्त के पहरे पर।

ना जाने किस मोड़ पर हूँ ज़िन्दगी के,
साफ़ नज़र नहीं आते, साफ़ किए हुए शीशे।
जाले लगे हैं घर के हर कोने में,
क़ुर्बत पड़ी है ना जाने किस कोने में।

मोह-त्याग कर मंज़िल का बैठकर सोचता हूँ,
लंबा सफ़र था... अब मैं थक गया हूँ।

 
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2 महीने पहले

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