कर्म
कर्म की आँधी में सब लिपट जाएगा,
वो बोलेगा और सब बिखर जाएगा,
जैसे-जैसे समाज में घृणा, ईर्ष्या छाएगी,
वैसे-वैसे प्रलय का समय और नज़दीक आएगा।
यूँ बैठकर तमाशबीन बनकर तू देखता रहेगा अन्याय को,
वो एक दिन तेरी चौखट पर ज़रूर आएगा,
जो जैसे करेगा, उसको वैसा मिलेगा,
ये सोचकर चलना कि एक दिन तेरा वक़्त भी ज़रूर आएगा।
मत कर घमंड किसी भी चीज़ का,
देने वाला वक़्त नहीं लगाएगा, जो दिया है वो फिर से छीन जाएगा,
रखेंगे अगर नज़र दूसरे की कश्ती पर,
तो ख़ुद की कश्ती को कैसे बचा पाएँगे।
मन के मायाजाल में फँसकर रह जाएगा,
बढ़ चल आगे, वरना हाथ कोई पीछे खींच जाएगा,
कोई अपना नहीं, सब पराए हैं, विश्वास ख़ुद पर रख,
सब अपने हिस्से का लिखवाकर लाए हैं।
— हिमानी त्यागी
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