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तुम्हारे बाद कोई मौसम नहीं आया

                
                                                         
                            तुम गए...
                                                                 
                            
और ऐसा लगा जैसे
मेरे भीतर की सारी ऋतुएँ
एक ही दिन में मर गईं।

अब न बरसात मुझे भिगोती है,
न धूप मुझे गर्माती है।
मैं चलता तो हूँ इस दुनिया में,
पर जैसे मेरी परछाई
मुझसे पहले ही थक चुकी हो।

कभी-कभी तुम्हारा नाम
होंठों तक आता है,
फिर मैं चुप हो जाता हूँ...
क्योंकि कुछ नाम
आवाज़ नहीं,
सिर्फ़ आँसू बनकर निकलते हैं।

तुम्हें शायद याद भी न हो
वो आख़िरी मुलाक़ात...
पर मैंने आज तक
उस पल को अपनी धड़कनों से
अलग नहीं किया।

लोग कहते हैं—
"सब ठीक हो जाएगा।"
मैं मुस्कुरा देता हूँ,
क्योंकि उन्हें कैसे बताऊँ,
कुछ बिखरे हुए रिश्ते
जुड़ते नहीं...
बस उम्र भर
दिल में चुभते रहते हैं।

आज भी जब रात
बहुत ख़ामोश हो जाती है,
मैं आसमान की ओर देखकर
एक ही सवाल करता हूँ—

अगर बिछड़ना ही लिखा था,
तो मिलाया क्यों था?

शायद प्रेम का सबसे बड़ा दर्द
जुदाई नहीं होता...
बल्कि यह होता है कि
जिसे कभी अपनी पूरी दुनिया कहा था,
एक दिन वही
आपको अपनी दुनिया से
बिना आवाज़ किए
निकाल देता है।

और फिर इंसान रोता भी नहीं...
बस जीता रहता है,
हर साँस के साथ
थोड़ा-थोड़ा टूटता हुआ।
— हेम
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2 महीने पहले

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