हम घोंट देते हैं गला,
तमाम तमन्नाओं का..
वक़्त के साथ।
सँजोया होता है,
जिन्हें हमने ख़ुद ही
बहुत अरमानों के साथ।
कई बार उन तमन्नाओं के
केंद्र में होते हैं खुद हम,
सिर्फ हम और सिर्फ हम
और कई दफ़ा,
चुनते हैं एक साथी।
बुनते हैं ख्वाब
साथ में हम ,साथ में हम।
तमन्नाओं का मरना,
पीड़ा की पराकाष्ठा है।
किंतु जब केंद्र में होते हैं हम
और दम तोड़ती हैं तमन्नाएँ,
तो ख़ुद को समझा लेते हैं
और ओढ़ लेते हैं,
एक नई चादर
तमन्नाओं की।
पर...
जब वही शख़्स
क़त्ल करता है हमारी तमन्नाओं का,
जिसके साथ मिलकर
हमने ज़िंदगी के
ख़ूबसूरत लम्हे चुने हों,
तब घुट-घुटकर मरती हैं
तमन्नाएँ... और हम भी।
तब न हम संजो पाते हैं
नए ख़्वाब,
न ही भूल पाते हैं
दम तोड़ती उन तमन्नाओं को।
तब लगता है,
तमन्नाएँ, प्रेम और ख़्वाब
अपने भीतर ही पलने चाहिए,
शायद कुछ सपने
सिर्फ़ अपने ही होने चाहिए।
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