काल से बना महाकाल हुं मैं
हर रूप से विक्राल हुं मैं
रंग से बेरंग हुं मैं
मन भोले संग हुं मैं
नीलकंठ विष से हुं मैं
हर अंत में समा शेष हुं मैं
सती का प्राण धरी शव हुं मैं
पार्वती का शिव हुं मैं
न आदी न अंत हुं अनंत मै
नाम से जो ले धनंत हुं मैं
वर दे वो अपार ब्रह्म हुं मैं
देव नाहीं मै तेरा ये तुझ्मे भ्रम हुं मैं
नाथ में एक नाथ हुं मैं
भोले मन का दीनानाथ हुं मैं
नश्वर हुं मैं
ईश्वर हुं मैं
किंचित नहीं पर निश्चित हुं
रहे तू हर पल निश्चिंत जो हुं मैं
बस तेरे पाप का प्रायश्चित हुं मैं
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