आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

काल से बना महाकाल हूँ मैं

                
                                                         
                            काल से बना महाकाल हुं मैं
                                                                 
                            
हर रूप से विक्राल हुं मैं

रंग से बेरंग हुं मैं
मन भोले संग हुं मैं

नीलकंठ विष से हुं मैं
हर अंत में समा शेष हुं मैं

सती का प्राण धरी शव हुं मैं
पार्वती का शिव हुं मैं

न आदी न अंत हुं अनंत मै
नाम से जो ले धनंत हुं मैं

वर दे वो अपार ब्रह्म हुं मैं
देव नाहीं मै तेरा ये तुझ्मे भ्रम हुं मैं

नाथ में एक नाथ हुं मैं
भोले मन का दीनानाथ हुं मैं

नश्वर हुं मैं
ईश्वर हुं मैं

किंचित नहीं पर निश्चित हुं
रहे तू हर पल निश्चिंत जो हुं मैं
बस तेरे पाप का प्रायश्चित हुं मैं

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर