प्रिय, कौन तुम मेरे हृदय में?
नित जीवन के कर्मों में
कोई बचाती हैं मुझे
मेरे सपनों के प्रलय में
प्रिय, कौन तुम मेरे हृदय में..?
भटक चुका हूं
अनन्त ब्रह्म - देवों
के चरणों में
पर एक विशेष देवी रहतीं हैं
मेरे मन के अरण्यों में
प्रिय, कौन तुम मेरे हृदय में..?
तपते तन के तपो भूमि में
किसी मृग सा
मन विचरण करता
किसी के शीतल स्मरणों में
प्रिय, कौन तुम मेरे हृदय में..?
मेरे कविताओं में स्तुति होती
एक अज्ञात,नारी रूप में
कमल पंखुड़ियों की
इस मन के सरोवर में
प्रिय, कौन तुम मेरे हृदय में..?
एक याचना होती
मेरे बातों के
अव्यक्त विवरणो में
प्रिय, कौन तुम मेरे हृदय में..?
एक कोयल बोलतीं
कोई गीत चलता
कल्पना के तरूण
भावों के उदय में
प्रिय, कौन तुम मेरे हृदय में..?
-हसदेव कुमार
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