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और बांझ क्या जाने प्रसव पीड़ा

                
                                                         
                            हम वैचारिक बांझ है
                                                                 
                            
और बांझ क्या जाने प्रसव पीड़ा
हमारे मस्तिष्क में नहीं उपजा कभी
कोई विचार पूंजीवाद पर.!!
माओवाद प्रताड़ना या अभिशाप पर..!
विस्थापन पर..!

जंगल के अनकहे संवाद पर

न हमने खोजी आधुनिकता के
नीचे दफन संस्कृति की लाश
ना कि हमने गुण्डाधुर की तलाश

हम चुप हैं
जातिय दंभ के नाम पर
देश में होने वाली उन कई मौतों पर
क्यों ये हत्या न होकर एक

अनुष्ठानिक वध होता है..?

हम वैचारिक बांझ है
और बांझ क्या जाने प्रसव पीड़ा

हम चुप हैं
जब
प्रश्न पुंछने पर किसी पत्रकार को
मारा जाता है
लोकतंत्र की चोली थाने में ही
उतारा जाता है...

हम वैचारिक बांझ है
और बांझ क्या जाने प्रसव पीड़ा

 
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एक घंटा पहले

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