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निहारु में रात के अंधेरे को

                
                                                         
                            निहारु में रात के अंधेरे को
                                                                 
                            
चैन से सो न पाऊं में
चैन से जी न पाऊं में
कैसी है जिंदगी ये
कभी खुद के मसले में उलझी
कभी घर के मसले में उलझी
तैराक को जैसा तैरना आता
नदी का किनारा पता होता है
काश कुछ ऐसा आलम्ब मेरे साथ होता
यू बैठ कर में रात न निहारती
अंधेरे में नज़रों को परेशान न करती
कैसी है जिंदगी कुछ समझ न आती ।।
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एक महीने पहले

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